"ग़ज़ल "
(2122 2122 2122 212)
आपने देखा पलट के, हँस दिये अख़बार पर।
क्या लिखा कितना लिखा है आज इस सरकार पर।/1/
आपकी हर नज़्म में है प्रीति की खुशबू भरा।
अब वसंती रंग दिखते हर नये अशआर पर।2/
दर्द लेने,दर्द देने,की कला का क्या कहें।
बात सर के पार है तो छोड़ दी करतार पर।/3/
आपका ये बांकपन भोली सी’ सूरत क्या गज़ब।
ये हया का रंग जो है आपके रुख़सार पर।/4/
जिन्दगी में हर तरफ बस भीड़ है, तन्हाई’ भी।
जो मिला अच्छा मिला अफ़सोस क्यूँ दातार पर।/5/
प्रीति की रानाई’ का क्या ही कहें कितना कहें.
दर्द भी अच्छा लगा है इक ते’रे इनकार पर।/6/
आप दरवाजे किये थे बंद फिर ना सो सके।
सोच में खोये पड़े थे गम के’ हर विस्तार पर।/7/
चाँद आहें भर रहा था चाँदनी थी रो रही।
क्या हुआ कैसे हुआ हम क्या कहें तकरार पर।/8/
~ डॉ अनिल कुमार दूबे ” अंशु “
(कवि, गीत /ग़ज़लकार )
नगवां, सिवान (बिहार )
