उलझन पे अक्सर स्नेह/ मयंक कुमार (पटना, बिहार)

शीर्षक- उलझन पे अक्सर स्नेह

मेरी लाख ख़ताओं के बाद भी जो मुझसे प्यार करती है,
मेरी हर टूटन को अपने दिल से जो पुकार करती है।

मैं जो कह न सका लफ़्ज़ों में, वो आँखों से पढ़ लेती है,
मेरी चुप्पी की हर साज़िश को भी स्वीकार करती है।

वो मोहब्बत है मेरी, ये बात मैं कह न पाया,
इसी उलझन पे अक्सर वो मुझसे तकरार करती है।

न समझे जब मेरी बात, तो रूठ भी जाती है,
पर मेरी एक आह पर ही वो फिर इकरार करती है।

प्यार उसका बेहिसाब है, इंतज़ार भी लाजवाब,
मेरे एक पल के लिए वो सदियाँ इंतज़ार करती है।

मेरी बेरुख़ी में भी वो वजहें तलाश लेती है,
मेरे हर गुनाह को वो खुद पे सवार करती है।

मैं पत्थर-सा रह जाता हूँ कई बार उसके सामने,
फिर भी वो अपनी नर्मी से मुझे गुलज़ार करती है।

मेरे नाम से धड़कता है उसका हर एक ख़्वाब,
मेरी राहों के काँटे वो खुद ही साफ़ करती है।

मैं जो थक जाऊँ ज़िंदगी से, टूट कर बिखर जाऊँ,
वो ही है जो मुझे फिर से खड़ा तैयार करती है।

साथ हो जब वो, तो मायंक भी हँस पड़ता है,
उसकी मौजूदगी ही मेरी दुनिया संवारती है।

मेरी हर कमी के बावजूद जो थामे है मेरा हाथ,
ऐसी लड़की ही सच्ची मोहब्बत की मिसाल बनती है।

काश एक दिन मैं कह सकूँ उससे बिना डर के,
कि मेरी हर साँस आज भी सिर्फ उसी से प्यार करती है।

मयंक कुमार (पटना, बिहार)

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