कुछ लोग/डाॅ प्रतिमा पाण्डेय

कुछ लोग बिना घरों के ही मर जाते हैं,
उम्मीदो के महल कितने भी बड़े हो
मिट्टी की दीवारें ही नहीं बना पाते हैं
हां !कुछ लोग
कुछ लोग बिना घर के ही मर जाते हैं।
सदियों तपते हैं वक्त की तेज धूप में
दिल रोता है फिर भी मुस्कुराते हैं
चंद सपने लिए आंखों की पोटली में
न खोलते ना बंद कर पाते हैं।
कुछ लोग बिना घरों के ही……
कुछ दीवारे और उम्मीदों के पर्दे
सजाते हैं हौसलों के झालरों से किराए के कमरें
इसी को अपना कहते नम आंखों से मुस्कराते हैं
हां! कुछ लोग…..
कुछ लोग बिना घर के ही मर जाते हैं।

डाॅ प्रतिमा पाण्डेय
प्रयागराज

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