कुछ सीखें आवाज़ नहीं करतीं,
वे धीरे-धीरे भीतर जगह बनाती हैं।
हर दूरी दंड नहीं होती,
कभी वह समझ का विराम होती है।
जो ठहरना सीख ले,
वह टूटने से पहले संभल जाता है।
जैसे बुल्ले शाह ने वर्षों तक प्रतीक्षा की,
वैसे ही समय ने सिखाया—धैर्य भी साहस है।
जल्दबाज़ी में मिले उत्तर अक्सर खोखले होते हैं,
पर देर से मिली समझ टिक जाती है।
पहले स्वयं को बदलना पड़ता है,
तभी परिस्थितियाँ बदलती हैं।
~ प्रज्ञान जैन
