चंद्रगिरी में चंद्रप्रभु के चरणों में तुम लीन हुए,
महावीर सी चर्या कर हे श्रमण सूर्य ! विलीन हुए,
किए प्रशस्त मोक्ष मार्ग उत्कृष्ट समाधि द्वारा आप,
पर भक्तों के ह्रदयांचल तो मानो सूर्य विहीन हुए !!
जीवन भर हम पुकारेंगे भी तो अब वो नहीं आएंगे,
जाते जाते सिखा तो देते कैसे हम जी पाएंगे !!
एक कदम भी बिना आपके हम तो नहीं बढा पाते,
इतना लंबा मोक्षमार्ग हम किसके भरोसे जाएंगे!!
सगे संबंधी और अपनों का साथ भी पहले छूटा है,
पर पहले तो कभी नहीं ये मन मेरा यूं टूटा है,
ह्रदय नहीं इस बार तो जैसे सब कुछ मेरा रिक्त हुआ,
असमय आपका गमन करा इस काल ने मुझको लूटा है!
माना अनियत विहारी हो तुम बिना कहे ही चल पड़ते,
धैर्य मग़र हम धर लेते कदम पुनः जब तक पड़ते,
ऐसा क्या निर्मोहीपन संकेत तनिक भी नहीं दिया,
पता जो होता हम सब मिलकर इस नियति से लड़ पड़ते!
मुक्ति नगर की राह में स्वर्ग का अभी पडाव तुम्हारा है,
तीर्थंकर बनने की विधि का रचा विधान ये सारा है,
समोसरण में हम भी बैंठें गणधर आपके बन जाएं,
भूल ना जाना मोक्ष दिलाना बस ये भाव हमारा है !!
विनयांजलि क्या लिक्खूंगा मैं तो निपट अज्ञानी हूं
‘माहिर’ सारे शब्द आपके मैं तो आपकी वाणी हूं,
किंतु मन वाचाल बहुत है चुप ना मैं रह पाऊंगा,
क्षमा कर देना मुझको भगवन् ये मेरी मनमानी हूं !
~ विरेन्द्र जैन “माहिर”
