आधार छंद गीत-वीणा छंद 16,16 सम मात्रिक
मापनी मुक्त दंडक छंद।
सीमा अंत 122, 22 चरण अंत।
जल ही जीवन है हम सबका, इसकी पावन बहती धारा।
जीवन दे पिता सभी को अब, उपयोगी है कितनी धारा।।
संग्रह कर लो मानव तुम,बंद करे अब नल की धारा।
जल है तो सुरक्षित अब कल है, बचा सहज अविरल ये qधारा।।
सरल भाव से मैं समझाती, बोध कराती सजती धारा।
जीवन दे पिता सभी को अब, उपयोगी है कितनी धारा।।
खेत खलिहान है लहराते, बगिया बन यह महकी धारा।
तरुवर पलता बन के निखरे, उपहार धरा बनती धारा।।
माटी को परम तिलक करता, उपजाऊ है करतीधारा।
जीवन दे पिता सभी को अब, उपयोगी है कितनी धारा।।
परम पिता का प्राण बन रहे, प्यास बुझाती सबकी धारा।
क्षणभंगुर जीवन इसके बिन, राह दिखाती सबको धारा।।
अभिराम लगायो दे नारा, कमल पुष्प बन खिलती धारा।
जीवन दे पिता सभी को अब, उपयोगी है कितनी धारा।।
जगदीश कौर प्रयागराज
