तुलसी तू ही है प्यार की सच्ची सूरत
तू ही है त्याग की मूरत
घर के बाहर होकर भी, कभी ना करती घर वालों से बगावत
समझ में नहीं आता तू पौधा है, या भगवान का रूप ली हुई औरत
कितने जमाने गुजर गए,
किसी ने तुम्हें घर के अंदर जगह नहीं दिया,
आधी तूफ़ान आए फिर भी,
तुम्हारे पत्तों ने कभी घर में आकर पलटकर जवाब नहीं दिया
तुलसी तू मीरा जैसा प्यार कर,
मगर हम कृष्ण भगवान होना नहीं चाहते.
तू बाहर ही धूप में जल जा,
हम तुम्हें अंदर लाकर फिर से फुलाना नहीं चाहते
तुलसी मेरे आँगन की,
सिर्फ कहने की बात है
हम तुम्हें कभी अपना बनाना नहीं चाहते,
अपना बनाना नहीं चाहते
~ सुहास लहुरीकर
