भीड़ के उस पार/ पूनम चौधरी

भीड़ के उस पार

मैं भीड़ के उस पार खड़ी हूँ
जहाँ तालियों की नहीं
धड़कनों की आवाज़ सुनी जाती है
यहाँ रिश्ते हाथ मिलाने से नहीं
नज़रों के ठहराव से बनते हैं
यहाँ अपनापन बताया नहीं जाता
वह चुपचाप निभाया जाता है
मैंने देखा है—
हँसते चेहरों के पीछे
कैसे भावनाएँ दम तोड़ती हैं
कैसे इंसानियत
पोस्टर बनकर रह जाती है
इसलिए मुझे प्रिय हैं वे लोग
जो कम बोलते हैं
पर उनके शब्द
दिल तक उतर जाते हैं
मुझे पसंद है वह सन्नाटा
जो ज़ख़्मों का तमाशा नहीं बनाता
जो रोने वाले से सवाल नहीं
सिर्फ़ पास बैठ जाना जानता है
मैं नहीं चाहती
दिखावे की ऊँची दीवारें
मुझे तो वह कच्चा सा घर चाहिए
जहाँ अपनापन छत बन जाता है
अगर यह अकेलापन है
तो मुझे स्वीकार है
क्योंकि यहाँ इंसान
अभी ज़िंदा है
और इंसानियत
अब भी साँस ले रही है।

~ पूनम चौधरी

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