मुट्ठी में आसमान/ डा.विजयानंद विजय

जगमग उजाला है, नूतन बिहान है।
प्यार की फुहार से, भींगा यह जहान है।
होगी पूरी हर लालसा, यही अरमान है।
मुट्ठी में तो आज, हमारे आसमान है।

जीवन में भले सबके, थोड़े-थोड़े दु:ख हैं।
उनमें ही खोजो तो, ढेर सारे सुख हैं !
धुप्प अँधियारे में ही, रोशनी के प्राण हैं!
मुट्ठी में तो आज, हमारे आसमान है।

जीवन-मरण सब, कुदरत के हाथ है।
संघर्ष और मनोरथ से, पूरी हर साध है।
हार के जो बैठ जाये, वही पछतात है।
मुट्ठी में तो आज, हमारे आसमान है।

जागो, उठो, दौड़ो, रूकने का न नाम लो।
ठहरा हुआ पानी, सड़ गया, वह व्यर्थ है।
मन से जो मर जाये, क्या मुरदे में भी जान है ?
मुट्ठी में तो आज, हमारे आसमान है।

  • डा.विजयानंद विजय
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