मैं कवि नहीं हूँ
जो कल्पनाओं के आकाश में,
उड़ान भरूँ
बनावटी काव्य लिखूं।
मैं ज़मीन पर चलता हूँ
और सच की मिट्टी से,
अल्फ़ाज़ उठाता हूँ
रूहानियत लिखता हूं।
मेरी क़लम
दिल को सुनती है,
जो जिया है वही लिखा है
जो सहा है वही उतरा है।
मैं रिश्ते गढ़ता नहीं
रिश्ते बुनता हूँ,
टूटे धागों से भी
उम्मीद सिलता हूँ।
मैं भावनाएँ सजाता नहीं
उन्हें महसूस करता हूँ,
और हकीकत को
लफ़्ज़ों में रख देता हूँ।
डॉ लाल थदानी
