“मेरी कविता”मर्जी का मर्ज/ पल्लवी द्विवेदी

थामा मैने एक कड़ी,
ज़र्रा ज़र्रा लिखती रोज
क्या लिख दूं उसको मैं “कविता”
या लिख दूं “मर्जी का रोग”!

उड़ेलती हुई वेदना, दुख और दर्द बताती ये
मेरे इस बीमार दिल के सारे मर्ज बताती ये
हाथों अपने लेकर चलती पकड़ के जिसकी मै इक डोर
क्या लिख दूं उसको मैं “कविता”
या लिख दूं “मर्जी का रोग”!

कभी लिखाती हास्य पूर्ण तो कभी लिखाती मुझसे व्यंग्य
मंचों पर जैसे ही चढ़ती भर देती मुझमें ये उमंग
श्रोताओं के दिल में यह ऐसे जाके घर कर जाती
जैसे कोई नदी किसी प्यासे को जा मिल जाती!
मुझमें कुछ ऐसे हैं समाई जैसे सांसों की डोर
क्या लिख दूं उसको मैं “कविता”
या लिख दूं “मर्जी का रोग”!

थक जाती मै जब जीवन से,
झुंझला जाती इस जग से समझाती फिर मुझको
की लिखो आज फिर से इक लेख
उलझन सारी उसमें डालो कहती मुझसे ये हर रोज
साथी मेरे रोने की और ये हंसने का मेरे कारण है
क्या लिख दूं उसको मैं “कविता”
या लिख दूं “मर्जी का रोग”!

हो जाती जब निराशा तब आशा ये बन जाती
कविता गर ना होती मेरी तो कैसे ये सब लिख पाती
मर्जी का ये मर्ज मेरा है, है ये मेरा सबसे अजीज
क्या लिख दूं उसको मैं “कविता”
या लिख दूं “मर्जी का रोग”!

पल्लवी द्विवेदी
प्रयागराज उत्तर प्रदेश!
8303370547

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