मैं कौन हूं ??
कभी खुद में खुद को ढूंढता हूं ,
कभी खुद में भगवत पूजता हूं।
अंधेरी रात में उजाले की आस लिए मैं आगे चलता हूं।
लिखने की कला को बिखेरता हूं ,
रास्तों से भरी झंकार को शब्दों में समेटता हूं ,
जो चुभता है उसे सच लिखता हूं ,
जो बहता है उसे भाव देता हूं।
हर डर से एकदम आगे बढ़कर मैं खुद को दर्शाता हूं,
दुनिया के सामने खड़े होने का डर है मुझे ,
नजरों के सवालों से घबराता हूं ,
कांपते आवाज थरथराते शब्द लिए फिर भी खुद को गढ़ता हूं ।
मैं कौन हूं??
मैं स्वयं को लिखता लेखक हूं ,
भाव प्रीत का सेवक हूं।
कलम को शस्त्र मानता हूं,
पुस्तक को सारथी बनाता हूं।
शब्दों की रणभूमि में उतरकर
मैं खुद से ही युद्ध कर जाता हूं।
दुनिया को लिखते-लिखते
खुद को भी लिख जाता हूं,
हर अनुभव, हर ठोकर
स्याही में बदल जाता हूं।
मैं लेखक हूं।
~ प्रतिमा गंधारिया
