यौवन से पूछो / देवेन्द्र चौबे

मै ये हूं, मै वो हूं, मै चाहे भी जो हूं,
मैं क्या हूं बताऊं कैसे अपनी जुबानी।
तू मुझसे न पूछो मेरी यौवन से पूछो,
या पूछो जिसे तुम हो कहते जवानी !

सरिता की वो अनेकों वाहिकाएं
मुझे देखकर तोड़ती थी सीमाएं
समेटे जिसे है ओ सागर की लहरे
या पूछो जिसे तुम समझते हो पानी
तू मुझसे न पूछो मेरी यौवन से पूछो ……

वो ताजी हवाएं, जैसे लिपट के मनाए
वो नभ की घटाएं जैसे आंचल ओढ़ाए
मेरी प्रेयसी से, प्रणय से ही पूछो
या पूछो जिसे पूछते हो जुबानी
तू मुझसे न पूछो मेरी यौवन से पूछो…..

न छूटा है मुझसे कोई उपवन की गलियां
बिन मेरे खिलती नहीं थी कोई कलियां
चंद मुरझाए फूलों के भौरों से पूछो
या पूछो जो थी उस समय की रात रानी
तू मुझसे न पूछो मेरी यौवन से पूछो…..

मेरे रक्त में भी अजब उष्णता थी
जो चाहूं,ओ लेलूं गजब दृढ़ता थी
थी चालाकियां क्या, अखाड़ों से पूछो
या पूछो जिसे कहते हो पहलवानी
तू मुझसे न पूछो मेरी यौवन से पूछो…..

नशे मे ही तब था, नशे में ही अब हूं
याद आए नहीं मयखाने गया कब हूं
थी लत गम को लेने की उससे ही पूछो
जिसे तुम समझते हो आखों का पानी
तू मुझसे न पूछो मेरी यौवन से पूछो…..

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