लगा दो कितने ही ताले मेरे मुंह पे,
मगर बोलूंगा तो सच ही बताऊंगा।
छिपा लो सच को तुम कितनी ही परतों में,
पकड़ कर हाथ सच को खींच लाऊंगा।
ये माना सच पे चलना है बहुत मुश्किल,
मगर मैं सच पे चल कर ही दिखाऊंगा।
अगर सच के सफर पर मौत है पक्की,
गले से मौत को भी मैं लगाऊंगा।
मैं झूठा हूँ तो जिंदा हूँ कहाँ खुद में,
मैं बोझा झूठ का अब ना उठाऊंगा।
मुआफी मांग कर दुनिया के मालिक से,
बस उसके हुकुम को ही मैं बजाऊंगा।
ज़बरदस्ती अगर झूठा बनाओगे,
तो तुमसे सारे रिश्ते तोड़ जाऊंगा।
अगर तुम सोचते हो कि खरीदोगे,
मैं सच कहता हूँ कि बिक ही न पाऊंगा।
तुम्हारा झूठ अपने पास ही रखो,
मैं अपने नाज और नखरे उठाऊंगा।
फिर एक दिन गर्व से सीना फुलाए मैं,
निशां अपना जहां में छोड़ जाऊंगा।
रामचन्द्र श्रीवास्तव
