वतन के रखवाले / दीप्ति गुप्ता’दीप’

सरहद पर तुम जान गंवाते,
कैसे कहूं दिखावा है।
जान गंवाना बात ना आसां,
कैसे कहूं छलावा है।।
निश्छल प्रेम है कैसे करते,
ये कोई तुमसे सीखें।
वतन के हो जाते हो तुम जब,
और ना कुछ तुमको दीखे।।
त्याग के अपना घर, आंगन, गलियां,
सरहद पर जब जाते हो।
सच्चे मन से उस दिन से ही तुम,
वतन के ही हो जाते हो।।
गर्मी, सर्दी या हो बरखा,
तुम्हें फर्क ना पड़ता है।
तुम सबका है प्रेम निराला,
जो दिन पर दिन बढ़ता है।।
तुम दुनिया के सूर्य की भांति,
तुम बिन यहां अंधेरा है।
आंखों के तुम तारे सबके,
दिलों में डाला डेरा है।।
शत् शत् नमन तुम्हे करते हैं,
श्रद्धा से शीश झुकाते हैं।
आज के दिन हम याद में तेरी,
एक एक दीप जलाते हैं।।

~ दीप्ति गुप्ता’दीप’
फर्रुखाबाद

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