सोच खा जाती है/ ओसमणी साहू “ओश”

सोच खा जाती है

निश्चिंतता का कवच चीर ,
ये समझ, कहां से आ जाती है,
मुझे सोच मेरी ही खा जाती हैं ;
मुझे सोच मेरी ही खा जाती हैं।

हो किसी से जब मधुर संवाद,
स्नेहिल हीय जमे विपुल गाद,
जन्म लेती इच्छाएं जब मन में
ये काली घटा सी छा जाती हैं।
मुझे सोच मेरी ही खा जाती हैं ।।

कलेजा छलनी सा लगता है,
बैठा मन फिर न उठता है,
संघर्ष करती, राह बनाती;
आती खुशी भरमा जाती है।
मुझे सोच मेरी ही खा जाती हैं।।

काम – काज सब छिन्न- भिन्न,
मन हो जाता खिन्न – खिन्न,
दिन खा जाती, रात खा जाती,
घड़ी मेरी पगला जाती है।
मुझे सोच मेरी ही खा जाती हैं।।

चहुंदिस प्रहारी अंधियारी,
विजित कभी, कभी मैं हारी,
दूर टिमकती आस ज्योति को;
आंधी बन बुझा जाती हैं।
मुझे सोच मेरी ही खा जाती हैं ।।

मन सब पर करता है भरोसा,
मस्तिष्क परखता, टटोलता ,
मन – मस्तिष्क में अंतर्द्वंद्व की
बिगुल नई बजा जा जाती हैं।
मुझे सोच मेरी ही खा जाती हैं।।

~ ओसमणी साहू “ओश”

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