हिसाब लगाकर बैठे है / गौतम चमन

सब कुछ हिसाब लगाकर बैठे है
दिल को यूँ ही सज्जाकर बैठे है

कृत्रिम फूलों की सुगन्ध गजब की
चमन में खुशबू लुटाकर बैठे है

रिश्तों को तराजू में तौला बार बार
मन को मन से यूँ ही लगाकर बैठे है

जीवन की सच्ची कहानी को देखा
वो कृत्रिमता की बातें बनाकर बैठे है

पल भर में बदल जाती आबोहवा चमन
बस दिल को दिल से समझाकर बैठे है

जीवन को समझने की कोशिश करे हम
वो आरोप पर आरोप लगाकर बैठे है
: मन लगने दो
*कवि गौतम चमन


थोड़े दिन गजल को रहने दो
चन्द शब्द कविता में कहने दो

मौसम बना है दिखावटीपन का
बेमौसम बारिश को बरसने दो

किस्मत एक सी होनी नहीं सबकी
राजा और रंक की जोड़ी सजने दो

हमने तो दीया जला रखा है याद में
भरे समन्दर में तूफान को भटकने दो

मुकन्दर का क्या भरोसा खुले कब
इसी आस पर जीवन को तुम चलने दो

आत्मा की बात वो करने लगे जब से
परमात्मा से संबंध हर रोज मन लगने दो

चमन मन विचलित है डर लगता मुझे
हालात कैसे भी बने बस उससे लड़ने दो

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