हे ! ज्ञान दायिनी हंस वाहिनी,वरद हस्त कर दे…/ सुश्री माधुरी करसाल ‘मधुरिमा’

हे ! ज्ञान दायिनी हंस वाहिनी,वरद हस्त कर दे…

हे ! ज्ञान दायिनी हंस वाहिनी, वरद हस्त कर दे…
ऋषि-मुनियों ने पाया जैसे, वैसे वरद तू दे …

हे ! ज्ञान दायिनी हंस वाहिनी,वरद हस्त कर दे..

हाथ जोड़ कर, लिए आरती समक्ष तेरे खड़े…
दया का सागर बोली मातृ,हम पर भी कृपा कर दे…

हे! ज्ञान दायिनी हंस वाहिनी,वरद हस्त कर दे…

ब्रह्म जी के कमंडल से उपजी, वेद-पुराण की ज्ञाता…
एक हाथ में पोथा रखती, दूजे में वरमाला..

हे ज्ञान दायिनी हंस वाहिनी, वरद हस्त कर दे….

श्वेत वसन धारण तू करती, श्वेत कमल में विराजे…
करुण-मंद मुस्कान है तेरी,शीश मुकुट है साजे…

हे! ज्ञान दायिनी हंस वाहिनी,वरद हस्त कर दे…

सुंदर पग में झांझर बाजे,मोर पंख पसारे..
जब वीणा की तान निकलती, देवलोक भी नाचें…

हे! ज्ञान दायिनी हंस वाहिनी,वरद हस्त कर दे….

~ सुश्री माधुरी करसाल ‘मधुरिमा’
बिलासपुर (छ.ग.)

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