है नमन उन वीरवर को

है नमन उन वीरवर को, मातृभूमि सुत धीर धर को,
देश पऱ होकर शहीद जो अमिट कहानी बन गये हैं,
है नमन उन वीरवर को….
हम ऋणी उन मां के जिनके खून से सिंचित हुए वो,
उन पिता को नमन है जिनको गर्व देकर खो गए वो,
धन्य वह देवी की जिसके सावन के झूले रुक गए हैं,
गर्व उन बहनों पर जिनकी राखी कलाई ढूंढती है,
उस वीर का जहां लहू गिरा हो पूजित निशानी बन गए हैं,
है नमन उन वीरवर को…
वो जूझते रण में लड़ें या प्रहरी सीमा पऱ खडे हों,
खौलता पारा कहीं तो कहीं पे जम जाता लहू हो,
उनके हर बलिदान जीवित हौसलों की कहते कहानी,
उनके ही दम पर है सुरक्षित अपनी ये सुखमय ज़िंदगानी,
उनके विजय की ठोकरो से शत्रुओं के शीश पानी पानी हो गए हैं,
है नमन उन वीरवर को….
है जीतना आदत हमारी हम धूल में दुश्मन मिलाते,
फिर सिकंदर हो या गोरी उसे मात देकर हम झुकाते,
गर्व है महाराणा पे हमको और गर्व चौहान पर भी,
हमसे टकराया है जो भी शूरवीर तो हम ही कहाते,
शौर्य के किस्से वो उनके जज़्बे रवानी बन गये हैं,
है नमन उन वीरवर को….

~ जय गुप्त
अंबिकापुर, सरगुजा (छ ग़ )

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