अरे ओ मेरी प्रिय दाल मसूर,
तुझे देखकर होता हूँ मैं चूर।
छोटे लाल दाने के रूप में,
जब तुम होती हो मशहूर।
अरे ओ मेरी प्रिय दाल मसूर,
हर जगह छाया तेरा ही सुरूर।
तेरे बिना तो ये चावल है सूना,
सदा करता हूँ तुझपे ही गुरूर।
अरे ओ मेरी प्रिय दाल मसूर,
जब सज-धजके तुम आती हो,
थाली में रखी उस कटोरी भर में,
खुश्बू से तेरी मैं मोहित हो जाता हूँ।
अरे ओ मेरी प्रिय दाल मसूर,
तुझमें है पोषण तत्व भरपूर।
तुझे खाकर बीमारी होती है दूर,
इसलिए तुम होती हो जग में मशहूर।
~ संदीप कुमार विश्वास
रेणगाँव,औराही-हिंगना
फारबिसगंज,अररिया-बिहार
