ज़िंदगी एक अजनबी किताब / कुसुम रानी सिंघल

बिना शीर्षक वाली कहानी और उपन्यास जैसी लगती है,
ज़िंदगी एक अजनबी किताब जैसी लगती है।

नाज़ुक से कोमल से आते हैं फरिश्ते,
आते ही बन जाते अनगिनत से रिश्ते ।
स्नेह और प्यार की बरसात सी लगती है,
ज़िंदगी एक अजनबी——-

शनैः शनै: ज़िंदगी चढती परवान,
अपनो और परायों की होने लगती पहचान।
ग्रीष्म की दोपहरी सी बनने लगती है,
ज़िंदगी एक अजनबी——-

मिलने लगती हैं सपनो को उडान,
भविष्य की चिंता और मैं की पहचान।
पतंग बन आसमान छूने सी लगती है ।
ज़िंदगी एक अजनबी———-

कथानक में उप कथानक गुँथने लगते है,
खुदी से खुद ही क्यों कटने से लगते हैं ।
दुख-दर्दों की बदरी छाने सी लगती है ।
ज़िंदगी एक अजनबी———

एकबार में एक ही पन्ना खुलता है,
विघि ने जो लिखा है वही मिलता है।
सच में बडी रहस्यमयी सी लगती है ।
ज़िंदगी एक अजनबी———

कभी अमावस कभी पूर्णिमा सी ढलती है,
अलग -अलग रंगों में खूब ही चमकती है।
ज़िंदगी एक अजनबी किताब सी लगती है ।

~ कुसुम रानी सिंघल

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