बिना शीर्षक वाली कहानी और उपन्यास जैसी लगती है,
ज़िंदगी एक अजनबी किताब जैसी लगती है।
नाज़ुक से कोमल से आते हैं फरिश्ते,
आते ही बन जाते अनगिनत से रिश्ते ।
स्नेह और प्यार की बरसात सी लगती है,
ज़िंदगी एक अजनबी——-
शनैः शनै: ज़िंदगी चढती परवान,
अपनो और परायों की होने लगती पहचान।
ग्रीष्म की दोपहरी सी बनने लगती है,
ज़िंदगी एक अजनबी——-
मिलने लगती हैं सपनो को उडान,
भविष्य की चिंता और मैं की पहचान।
पतंग बन आसमान छूने सी लगती है ।
ज़िंदगी एक अजनबी———-
कथानक में उप कथानक गुँथने लगते है,
खुदी से खुद ही क्यों कटने से लगते हैं ।
दुख-दर्दों की बदरी छाने सी लगती है ।
ज़िंदगी एक अजनबी———
एकबार में एक ही पन्ना खुलता है,
विघि ने जो लिखा है वही मिलता है।
सच में बडी रहस्यमयी सी लगती है ।
ज़िंदगी एक अजनबी———
कभी अमावस कभी पूर्णिमा सी ढलती है,
अलग -अलग रंगों में खूब ही चमकती है।
ज़िंदगी एक अजनबी किताब सी लगती है ।
~ कुसुम रानी सिंघल
