कुण्डलिया छंद-
बदला आज समाज है, विकसित है संचार।
गया जमाना पत्र का, बंद हुए अब तार।।
बंद हुए अब तार, लगे मोबाइल प्यारा।
वृद्ध युवा हर बाल, सभी का बना सहारा।
सुगम बना दे काम, कभी करवा दे घपला।
दिखे आज हर हाथ, सभी का जीवन बदला।।
योग-
सच्चा सुख तब ही मिले, काया रहे निरोग।
इसे साधने के लिए, करना निशदिन योग।।
करना निशदिन योग, संग में हो कुछ आसन।
सुधरे पाचन तंत्र, स्वस्थ रहते हैं तन मन।।
हल्का लें आहार, अंकुरित हो कुछ कच्चा।
मिले सदा आरोग्य, वही सुख होगा सच्चा।।2।।
भौतिक धन-
भौतिक धन की लालसा, सदा बिगाड़े काम।
सीख सिंकदर दे गया, चले न सँग में दाम।।
चले न सँग में दाम, हाथ खाली ही जाना।
भागदौड़ सब व्यर्थ, बात दिल में बैठाना।।
धरता जो संतोष, वही रचता है स्वास्तिक।
‘हिम्मत’ बढ़ता लोभ, बनें दुखकर धन भौतिक।।3।।
निंदा-
चलना सत्पथ पर सदा, करें नेक हम कर्म।
चुगली निंदा क्यों करें, समझें इसका मर्म।।
समझें इसका मर्म, पाप कितना है भारी।
सुखद बुझाकर दीप,राह चुनता अँधियारी।।
प्रगति पराई देख,द्वेष वश कभी न जलना ।
‘हिम्मत’ हृदय उतार, नेक पथ पर नित चलना।।4।।
नेता
घोटाले नेता -करे, हड़पे जग का माल।
जैसे ही कुर्सी मिली,उसे बना ली ढाल।।
उसे बना ली ढाल, तरीके अपने बदले।
बनकर फिरे शरीफ,दबाकर सारे मसले।
हिम्मत से कर गुप्त, कारनामें सब काले।
रखी ताक पर लाज,करे नित नव घोटाले।।5।।
~हिम्मत चोरड़िया प्रज्ञा कोलकाता,लाडनू्
