आज भी हर घर में एक दुर्योधन होता है
उसके अत्याचार से कमज़ोर भाई रोता है
दिखाता है अपना दबदबा वो हर चीज पे
शांति सा बने घर हस्तिनापुर को तोड़ता है
उतना नशा भी शराब में नहीं होता
इतना हमारे क्रोध में हो जाता है
बने फिरते हैं संसार में हम अच्छे इंसान
फिर मेरे मन का संत पीर कहां सो जाता है
जमीन के बंटवारे बेटे कर लेते हैं
तिजोरी पोटलिया अपनी वो भर लेते हैं
रखें कौन वो ममता बैठी उम्मीदें लगाएं
वह बेचारे माता-पिता भी इतने मर लेते हैं
सच तो अब किताबों में ही रह गया
जब सच न चले अहसास ये कह गया
मैं बिलाल बैठा सोचते रह गया इसी फिक्र में
कहरे खुदा से वो झूठा आशियाना ही बह गया
~ चौधरी बिलाल
