गजल
सबकुछ था पास मगर जाने क्यूं
खुद से ही तन्हा हो गये देखते देखते
हमने उनसे थोड़ा सा वक्त मांगा
वो हमसे ख़फा हो गये देखते देखते
मेरा ज़िन्दा रहना तो बस मजबूरी थी
मजबूरी कब ज़िन्दगी बन गयी देखते देखते
राहों में हमें देखकर भी अनजान बन गये
हम मायूसी में भी मुस्कुरा दिए देखते देखते
दिल अकसर पसीजता है उनकी याद में
उनकी याद जी का जंजाल बन गई देखते देखते
सूरत धुन्धला सी गई आंखों में उनकी
वो ख्वाब में आ गये देखते देखते
ज़िक्र हुआ महज़ मतलब से हमारा
हम मतलबी हो गये देखते देखते
झुर्रियां आने लगी रूख़सार पर मेरे
वो मेरी सीरत पर फ़िदा हो गये देखते देखते
आसमाँ नीली चादर ओढ़े हुए था
धूप में अचानक बरखा आ गई देखते देखते
दुआ की थी उनकी खुशियों की ख़ातिर ‘नूर ‘
वो तोहफ़े में बद्दुआ दे गये देखते देखते।
