खामोशी की गूंज/

आज जो खामोशी में लिखने जा रहा हूँ, उसमें गर्व है।
यह खामोशी उन सभी लोगों के मन की है

जिनके बेटे/पति देश के लिए कुर्बान हुए हैं।
यह उन शहीदों के घर की खामोशी है

जो अपने बेटे की याद में शांत हो गए हैं।

ये खामोशी मां के आंसुओं के पीछे की है,
ये खामोशी पिता के मन के भीतर की है।

ये खामोशी किसी डर की नहीं,
ये तो बलिदान से उपजी शांति है।

इस खामोशी में तिरंगा लहराता है,

बिना हवा के, बिना शोर के।

क्योंकि बलिदान कभी आवाज़ का मोहताज नहीं होता।

ख़ामोशी में भी उसकी गूंज सदियों तक सुनाई देती है।

~ सुहास लहुरीकर

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