फूली-फूली, खस्ता-करारी, ओह क्या नज़ारा है,
हर निवाले में छुपा ज़ायका, जैसे कोई प्यारा इशारा है।
भीतर मसालों की महफ़िल, जायके की भराई है,
ऊपर खजूर की चटनी, जिसमें इमली की शरारत समाई है।
धनिया-पुदीना की ताज़गी, मिर्ची की तीखाई है,
आलू की सब्ज़ी का साथ, और कढ़ी की गरमाई है।
कभी मीठे-खट्टे पेठे का संग, कभी दही की ठंडक मिल जाए,
मूंग दाल की संगत आ जाए तो, मज़े ही मज़े खिल जाएं।
कभी प्याज़-आलू की पहचान, कभी सादी भी भा जाए,
कभी ब्रेड में लिपटी मिले तो, दिल बच्चा बन मुस्का जाए।
कचौरी खाओ जी भर कर, ये रस्म अधूरी ना रह जाए,
ये सिर्फ़ पेट नहीं भरती, ये मन की भूख मिटा जाए।
~ अभिषेक शर्मा
