मेरा कौन सा घर है?
आती है घर की याद बहुत, पर क्या करें हम नारी हैं,
दो घरों की होकर भी, अपनी पहचान से हारी हैं।
जिस आँगन को पल-पल सींचा, अपना कह नहीं पाते हैं,
सालों जिसे सजाया हमने, उसमें रह नहीं पाते हैं।
कहने को दो घर हैं अपने, पर कोई नहीं ठिकाना है,
बिना इजाज़त अब तो अपने, मायके भी नहीं जाना है।
वो चिड़िया जो उड़ गई घर से, लौट के कब वो आएगी,
रस्मों की इन बेड़ियों में, वो घुट-घुट कर रह जाएगी।
एक घर ने दी विदाई हमें, दूजा पराया कहता है,
दर्द भरा है दिल के अंदर, पर चेहरा हँसता रहता है।
बचपन वाली वे गलियाँ, बस ख़्वाबों में अब आती हैं,
पुरानी यादें सीने में, एक टीस जगा कर जाती हैं।
पराई हो गई वो कोख अब, जहाँ हमने जन्म लिया था,
सौंप दिया सब कुछ उसको, जिसे हमने वचन दिया था।
यादें तो हैं साथ हमारे, पर दहलीज़ें बेगानी हैं,
अजब है ये दास्ताँ, और अजब स्त्री की कहानी है।
~ गीतांजलि धर्मेश पोलाई ‘ गीत ‘
सूरत, गुजरात
