आत्मा की आवाज़
आत्मा की खामोशी में भी इक आवाज़ होती है,
ये एक छुपी हुई रब से दिल की दुआ होती है।
इंसानी जज़्बात जब लफ़्ज़ों में ढलने से लगे,
रूह की दिल में फिर इक रौशनी सी होती है।
कुछ नेक काम दिल पे यूँ ही नहीं उतर जाते,
रूह की तह में उतरकर ये अमल में आते है।
रूह के जज़्बात भी क्या अजीबो गरीब होते हैं,
ख़ामोश हों तो दिल में इक तूफ़ान को बोते हैं।
कभी सितारों की तरह रातों में झिलमिलाते हैं,
कभी जज़्बात की धूप बनकर उतर आते हैं।
दुआ बनकर ज़िंदगी की राहों में खो जाते हैं।
नफ़रत से कहीं दूर सच्चाई की लौ में बहते हैं।
रूह के एहसास चेहरे पर भी नहीं लिखे जाते,
बिखरे हुए इंसान को चिराग़ ए नूर कर जाते हैं।
- डॉ शरीफ़ ख़ान
