छोटी सी थी गुड़िया आयी/ रीमा

छोटी सी थी गुड़िया आयी इस दुनिया में, हंसती , खिलखिलाती
झुमुर झुमुर सी पायल पहन घर भर में इतराती।
बड़ी हुई….स्त्री बनी
वही पायल की रुनझुन अब जिंदगी की अदृश्य बेड़ियां बन गयी।
समझ ना पाई कि
कब पायल बेड़ी बन गयी।
हर गलती की जिम्मेदार वो ही क्यूं बन गयी।
चरित्र संभालना, रिश्तों की मर्यादा निभाना,
हर कसौटी पर वही क्यूं आज़माई गई।
पायल की रुनझुन में अपनी आंसुओं की आवाज छुपाती रही,
गुड़िया अब समझी पायल का असली अर्थ क्या है।
स्त्री होके हर आवाज का उतार चढ़ाव की समझ उसे अब आ गयी,
गुड़िया से स्त्री बनने तक एक उम्र निकल गयी।
अपने सपनों को दबाकर,
दूसरों के ख्वाब संवारती रह,
छोटी सी गुड़िया आज कितनी बड़ी हो गई।
कविता बन गयी।
गुड़िया आज कितनी बड़ी हो गयी,
जिंदगी की राहों में उसने सीखा बहुत कुछ
अपने सपनों को दबाकर दूसरों के सपने देखे
इतनी वह समझदार हो गयी।
स्त्री बन गयी वही छोटी सी गुड़िया।
गुड़िया से स्त्री बनने की कहानी,
आज कविता बन गयी।

~ रीमा

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