एक दिवाली दीप जलाये, मैंने थे लहु के, / नीलम रानी गुप्ता, लेखिका

एक दिवाली दीप जलाये, मैंने थे लहु के,
लौ थी जिनकी वो सपूत, जो हुए शहीद कभी थे।।

नाम नहीं पता है मुझको, सच, किसी को नहीं पता है,
युद्ध में मरने वालों को कभी, किसी ने क्या गिना है?

आज गये, कल गये, उनकी लिस्ट लिख लेंगे,
लेकिन आजादी में जो गये, उनको कहाँ ढूँढेंगे?

देश का सौदा करने वालों, कोई होगा नहीं तुम्हारा।
तुमको कहा नहीं होगा कभी, किसी ने कहीं बेचारा।।

तभी लगा दी दांव साख की, नहीं पता कीमत किसी सांस की।
नहीं पता है किसी दर्द का, न कीमत ही आजादी की।।

जिनके कारण घर तुम्हारे,जल रहे दीप हैं घृत के।
है रोशनी इंतजार में, घर एक दीप हो उनके।।

हर रोज तुम्हारे घर में होती, होली और कव्वाली।
लड़ियाँ जलतीं असंख्य बल्ब की, और मनती रोज दिवाली।।

तुम क्या जानों दर्द को उनके, जो जीवन में हारी।
भूखे पेट ही सोना जिनके, घर की है लाचारी।।

नीलम रानी गुप्ता, लेखिका

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