शीर्षक- ठंडक भरी छाँव, मेरा गाँव
गाँव की सुनी गलियों में, अभी बहुत सुकून है
गुजरते भले कम लोग है, रौनक उसमे खूब है
नही कोई शोर शराबा, न सड़कों में जाम है
तंग गली भली गाँव की, खुशियों की हर शाम है।
कवेलू वाले घर में भी, ठंडक वाला आराम है
मिट्टी की दीवारों में भी, मजबूती बेमिसाल है
राम-राम का संबोधन में, देखों कितना सम्मान है
पहनावे भले सरल हो, अदब यहाँ पहचान है।
बूढ़ा बरगद ऊंची नीम, खटुआ आम की छांव है
चौपालों में बूढ़ों की गपशप, इसमें बड़ी मिठास है
बिकता नही पानी यहाँ, नही बिकता सम्मान है
मेरा गाँव सरल सजीला, यह इसकी पहचान है।
सब जुड़े है मिट्टी से, मिट्टी से सब जन रंगे-भीगे
दूध मट्ठा लस्सी घी खाकर, सब चुस्त पले बढ़े
शुद्ध हवा, शुद्ध साग है, सरिता में है निर्मल जल
सब रहते मिलजुलकर, जैसे वसुधैव कुटुंबकम।
रचनाकार
श्याम कुमार कोलारे
