ढूँढता रहा
अनवरत तुमको,
जंगल, नदियाँ
पहाड़ों में।
शीत, ताप
छाया में ढूँढा,
वैराग्य और
माया में ढूँढा।
तृषित-सा
अकुलाता ढूँढा,
झरनों की निर्मल
धारों में।
सुबह, शाम
और रात में ढूँढा,
इंद्रधनूषी
बरसात में ढूँढा।
पंछियों-सा
फड़फड़ाता ढूँढा,
मनमोहक बसंत
और बहारों में।
घर, बाहर
बाजार में ढूँढा,
गली, कूचे
संसार में ढूँढा।
हवाओं-सा
टकराता ढूँढा,
दरख्तों और
दीवारों में।
हानि, लाभ
व्यापार में ढूँढा,
दुखी, पीड़ित
लाचार में ढूँढा।
भौंरों-सा
मंडराता ढूँढा,
गुलों और
गुलजारों में।
आन, बान
और शान में ढूँढा,
शक्ति, सामर्थ्य
अभिमान में ढूँढा।
अज्ञानियों-सा
घबराता ढूँढा,
तंत्रों और
चमत्कारों में।
नशा, मद और
मांसाहार में ढूँढा,
कला, संगीत
शृंगार में ढूँढा।
अघोरियों-सा
लड़खड़ाता ढूँढा,
मरघट, भस्म
और हाड़ों में।
अंतर्मन में
जब झाँका तो,
प्रेम की आँखों
से आँका तो।
स्पष्ट हुई
आकृति तुम्हारी,
मीठी धूप-सी
जाड़ों में।।
