समर्पण/ मंजू दलाल ‘मञ्जरी’।

खुद का करके पूर्ण समर्पण
तिरोहित किया कर खुद का तर्पण
लेकिन फिर भी कमी दिखाएंँ
लाऊंँ कहांँ से इतर वह दर्पण।

छोड़ आई सारे आकर्षण,
किसी से किया न कोई घर्षण,
न ही कभी अनर्गल प्रलापा,
सुनती रही सभी का अलापा।

कब कोई चाहत जताई,
कब किसी की त्रुटि बताई,
खुद ही करती रही भरपाई,
बेवक्त मर गयी मेरी तरूणाई।

आज जीवन के इस अवसर पर,
सोच रही हूं क्या पाया खुद को खोकर,
थोड़ा हटकर ही तो था स्वप्न मेरा,
बस अभी तो शुरू थोड़ा था उकेरा।

उसमें भी आ अड़चन डाली,
झुका ही दी वो नाजुक सी डाली,
कितने जतनों से उसने पाली थी,
ले रहे गई अब तो बिन माली।

छक गई कर अर्पण तर्पण और समर्पण,
तेरे भरोसे जीवन मेरा मेरे भगवन,
सुना है मैंने तू सबकी सुनता है,
कमी बेशी किसी की कहांँ गुनता है।

मंजू दलाल ‘मञ्जरी’

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