(“मेघ बरस रहे यमदूत बन”)
प्रकृति प्रचण्ड प्रलय-रूप धरि,
हर लेती प्राण निरीह जन।
दया–धर्म का चिह्न न रहा,
करुण पुकार हुए नयन।
मेघ बरस रहे यमदूत बन।१
मानव स्वार्थ-विभोर हुआ,
हिमगिरि का चीर हृदय किया।
लोभ-ज्वाला से जग दग्ध हुआ,
पथ धर्म–कर्म सब त्यज दिया।
मेघ बरस रहे यमदूत बन।२
आपद से निज रक्षा करनी,
प्रकृति को माँ पहचानो।
संरक्षक बन साथ निभाना,
धरती को शीश नवाओ।
मेघ बरस रहे यमदूत बन।३
किन्तु अहंकार में डूब गया,
ईश्वर-भय भी खो बैठा।
धर्म–कर्म सब व्यापार बने,
क्या मानव धर्म निभा पाया?
मेघ बरस रहे यमदूत बन।४
~ सतीश कुमार भट्ट
